हाँ भाई, हाँ. पता है कि पुरानी न्यूज़ है, पूरी दुनिया को पता है। मैंने भी देखा था कभी तो, पर आज मेरे घनिष्ट मित्र स्वामी हग्नेश दास कि ये पोस्ट देख के दिल जिगर गुर्दे फेफड़े मचल उठे। तमन्ना जाग उठी कि मैं भी हिंदी में लिखूं। एक ज़माना था, मैंने भी हिंदी ब्लोग शुरू किया था। अब अलग ब्लोग तो चलने से रहा, यहीं पर हिंदी शुरू कर रहा हूँ। वैसे हिंदी ब्लोग्गिंग इस गूगल टूल की मोहताज नहीं, इसके आने से काफी समय पहले से ही हिंदी ब्लोग्गिंग का परचम पुरजोर लहरा रहा है। अक्षरग्राम पर सक्रीय नारद आपको बहुतेरे हिंदी ब्लोग्स की लिंक्स देगा जो की content में अंग्रेजी ब्लोग्स से कम नहीं हैं।
पर एक बात तो है, हिंदी ब्लोग्गेर्स अक्सर क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग करते हैं, जो कि आम बोल-चाल वाली हिंदुस्तानी भाषा से थोडा हट के है। मानो या ना मानो, उर्दू, अरबी की ही तरह अंग्रेजी और कई पश्चिमी भाषाओं के भी काफी अलफ़ाज़ हिंदी में इस क़दर मिल चुके हैं की उन्हें अलग करना सही नहीं होगा। जैसे, बस, ट्रेन, सिगरेट आदि। अब बचपन में सबने इनके हिंदी शब्द सुनें होंगे और हँसे होंगे, पर कोई ये नही कहता होगा कि "सवेरे लौह पथ गामिनी, छुक-छुक वाहिनी से चले जायेंगे!" खैर।
अब एक unrelated बात, सबने देखा होगा, हर बिल्डिंग में FIRE लिखे लाल अलार्म बटन. सबमें शीशा लगा होता है। आग लगे तो शीशा तोड़ो, घंटी बजाओ। अब शीशा क्यों? यहाँ तक की शीशा तोड़ने को हथोडा भी साथ में लगा देते हैं। तो फिर, शीशा क्यों? जैसे की कईयों ने सोचा लिया होगा, मैं भी सोचता हूँ कि ऐसा इसलिये कि कोई बिना किसी urgency के घंटी ना बजा दे। थोडी गूग्लगिरी करके देखा मैंने, पर इस रहस्य पर से पर्दा ना उठ सका। (Q. लिफ्ट्स में "Stop" और "Alarm" buttons पर शीशा क्यों नही है?) Main कारण यही है कि - Prevention is better that cure. अमेरिकी इस राय से कतई इत्तेफाक नही रखते। हाल ही Virginia Tech में हुआ shootout ऐसा सबसे बड़ा हादसा था, पर ऐसा पहला हादसा नहीं था। हर दफा ऎसी किसी घटना के बाद US में एक lobby जाग उठती है। ये वो लोग हैं जो चाहते हैं कि आम जनता से घातक हथियार रखने का हक वापस ले लिया जाये। ऎसी ही सोच वाला एक शख्श है Michael Moore। फिल्म Bowling for Coulmbine में उन्होने Coulmbine High School में हुये बेहद similar हादसे से जुडे तथ्य दिखाए हैं और कई सवाल उठाये हैं। पर नतीजा कुछ ना निकला, और फिर जो हुआ वो शायद रोका जा सकता था।***
मेरा time यहाँ अच्छे से ही कट रहा है. हफ्ते भर तो घर से ऑफिस और ऑफिस से bed ही चलता है, weekends का इंतज़ार है.यही कहानी है, इतना ही फ़साना है,
8 बजे जाना है, 9:30 पे आना है :-(
han bhai aap write bolte hain, ek to computer main likhna itna kathin aur upar se bahut kathin bhasha ho to door se raam raam kar lete hain log baag
ReplyDeleteaapka swagat hai jat-boy.. vaise hindi main comment kaise likhte hain.. jaanke accha laga ki tum london main masti kar rahe ho, main to akela bilkul bore ho gaya tha ek mahina.. chalo njoy maadi mitr.. aapka hagnesh !!
ReplyDeletewow!! hindi me blog..phad kar bahut ahchca laga...
ReplyDeleteTake care...
बाढिया है जी। लगे रहो ! :-)
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ReplyDeleteUttam.. ati uttam :)
ReplyDeletehe he ... mere hi man ki bat keh rahe ho mitr. but weekend is here !
ReplyDeletepankaj
आपकी हिन्दी की चिट्ठी पढ़ कर अच्छा लगा पर आपकी यह बात कि, 'पर एक बात तो है, हिंदी ब्लोग्गेर्स अक्सर क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग करते हैं, जो कि आम बोल-चाल वाली हिंदुस्तानी भाषा से थोडा हट के है।' सच नहीं है। हिन्दी चिट्ठाकार बोल-चाल की ही हिन्दी प्रयोग करते हैं
ReplyDeleteनमस्ते!
ReplyDeleteआपकी हिन्दी ’बाकी सब ठीक है’( अगर मै गलत हूं तो सही नाम बताएं) मे भी पढी थी..आशा है लंदन के समाचार हिन्दी मे उपलब्ध कराते रहेंगे..और ये बात सच नही है कि ज्यादातर क्लिष्ट हिंदी लिखी जा रही है...आम बोलचाल की भाषा ही उपयोग मे लाई जा रही है.
Cool blog IITians..!! and cool comments too by Rachna
ReplyDeleteLove our own languages...
-Non IITian..
भाई, अब मैं भी हिंदी में लिख सकता हूँ! इसीलिये एक बार फिर से कहता हूँ, "उत्तम, अति उत्तम"!
ReplyDeleteyeh toh acha hai, aise kaise...matlab aise kaise...par yeh padh ke mere man mein bhi icha ayee janane ki ki FIRE sheeshe ke peeche kyun hai wid hammer.Did u get the answer to this??
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